जब से लिया जन्म हे मानव,
वसुधा का दोहन ही किया |
छाती पे तू अन्न उगाया,
पेट से पानी खींच लिया |
इतने से जो मन न भरा,
तो तरह तरह से नाश किया |
जंगल काटे, पर्वत तोड़े,
सागर का मंथन भी किया |
धरती के ही नाम पे तूने,
युद्ध कई लड़ डाले |
एटम बम, मिसाइल कितने,
माँ की छाती पे दागे |
कभी धर्म की ओंट लिया,
तो कभी स्वार्थ का साथी |
तू निर्दयी कभी ना समझा,
वसुधा माँ की भांती |
बाँट दिया टुकड़ो टुकड़ो में,
हर टुकड़े पे राज किया |
जिसको साथ न ले के आया,
उस पे तू अधिकार किया |
वसुधा की ममता तो देखो,
इतने पर भी लाड़ दिया |
मानव का मृत शरीर भी,
उसने अंगीकार किया |
नरता का अभिज्ञान रहे,
तो वसुधा का सम्मान करो |
सीचो इसको प्रेम से मानव,
हर प्राणी का मान धरो |
चाँद तुम्हारी मुट्ठी में हो,
अंतरिक्ष भी घर बन जाए |
पृथ्वी 'माँ' है ध्यान रहे,
सीमाएं कितनी बन जाएँ |
Friday, August 20, 2010
Saturday, August 7, 2010
मुखातिब
मुखातिब होके मुझसे वो यही हर बार कहते हैं ...
तालुक्कात की बात करते हो जज्बात कहा रखते हो !!
समां को जलते रहने की सदा ताकीद देते हो ..
कभी जब आंच आती है तो चेहरा क्यूँ ढकते हो !!
कभी आँखों में झांको और अपना अक्स पहचानों
ये अपनी अजनबीयत आईने में ढूंढते क्यूँ हो !!
अगर मुमकिन है चलना साथ तो आओ मेरे संग तुम
इन अनजान गलियों में भी बेगानों से लगते क्यूँ हो !!
तालुक्कात की बात करते हो जज्बात कहा रखते हो !!
समां को जलते रहने की सदा ताकीद देते हो ..
कभी जब आंच आती है तो चेहरा क्यूँ ढकते हो !!
कभी आँखों में झांको और अपना अक्स पहचानों
ये अपनी अजनबीयत आईने में ढूंढते क्यूँ हो !!
अगर मुमकिन है चलना साथ तो आओ मेरे संग तुम
इन अनजान गलियों में भी बेगानों से लगते क्यूँ हो !!
Friday, February 6, 2009
जयघोष
नूतन प्रभात की बेला का
आह्वान किया है जन गण ने
अब मचल रही हर एक तरंग
जयघोष किया है किरणों ने
मानव जीवन की अभिलाषा
पूरी होने को लालायित है
समृद्धि शान्ति और खुशहाली
आगे की नई कहानी है
आगाज किया था पांडवों ने
परिणाम मिला था महाभारत
आगाज करेंगे प्राणी समूह
अंजाम मिलेगा समृद्ध भारत
अब रोक नही सकता अन्धकार
शाश्वत की ओर बढे क़दमों को
अब मिलने को आतुर है मंजिल
कोटिजनो के संघर्षों को
अब छिपा हुआ है कहीं तिमिर
शोषित हो जाने के भय से
अब चमक उठा है प्रबल सूर्य
मानव मानव के चिंतन में
छट गई मेघ व्याकुलता की
आशाओं को उत्कर्ष मिला
भावों के प्रबल प्रवाहों को
उत्साह मिला गंतव्य मिला
अब विकास की आंधी से
लहलहा उठा है मानव मन
खिल उठी उमंगो की बेला
करने को प्रणय भाव विह्वल
जागृत मन की अभिलाषा को
विस्तार सहित आकार मिला
अब बढे हुए क़दमों को तो
मंजिल का भी आभास मिला
आह्वान किया है जन गण ने
अब मचल रही हर एक तरंग
जयघोष किया है किरणों ने
मानव जीवन की अभिलाषा
पूरी होने को लालायित है
समृद्धि शान्ति और खुशहाली
आगे की नई कहानी है
आगाज किया था पांडवों ने
परिणाम मिला था महाभारत
आगाज करेंगे प्राणी समूह
अंजाम मिलेगा समृद्ध भारत
अब रोक नही सकता अन्धकार
शाश्वत की ओर बढे क़दमों को
अब मिलने को आतुर है मंजिल
कोटिजनो के संघर्षों को
अब छिपा हुआ है कहीं तिमिर
शोषित हो जाने के भय से
अब चमक उठा है प्रबल सूर्य
मानव मानव के चिंतन में
छट गई मेघ व्याकुलता की
आशाओं को उत्कर्ष मिला
भावों के प्रबल प्रवाहों को
उत्साह मिला गंतव्य मिला
अब विकास की आंधी से
लहलहा उठा है मानव मन
खिल उठी उमंगो की बेला
करने को प्रणय भाव विह्वल
जागृत मन की अभिलाषा को
विस्तार सहित आकार मिला
अब बढे हुए क़दमों को तो
मंजिल का भी आभास मिला
Subscribe to:
Posts (Atom)