जब से लिया जन्म हे मानव,
वसुधा का दोहन ही किया |
छाती पे तू अन्न उगाया,
पेट से पानी खींच लिया |
इतने से जो मन न भरा,
तो तरह तरह से नाश किया |
जंगल काटे, पर्वत तोड़े,
सागर का मंथन भी किया |
धरती के ही नाम पे तूने,
युद्ध कई लड़ डाले |
एटम बम, मिसाइल कितने,
माँ की छाती पे दागे |
कभी धर्म की ओंट लिया,
तो कभी स्वार्थ का साथी |
तू निर्दयी कभी ना समझा,
वसुधा माँ की भांती |
बाँट दिया टुकड़ो टुकड़ो में,
हर टुकड़े पे राज किया |
जिसको साथ न ले के आया,
उस पे तू अधिकार किया |
वसुधा की ममता तो देखो,
इतने पर भी लाड़ दिया |
मानव का मृत शरीर भी,
उसने अंगीकार किया |
नरता का अभिज्ञान रहे,
तो वसुधा का सम्मान करो |
सीचो इसको प्रेम से मानव,
हर प्राणी का मान धरो |
चाँद तुम्हारी मुट्ठी में हो,
अंतरिक्ष भी घर बन जाए |
पृथ्वी 'माँ' है ध्यान रहे,
सीमाएं कितनी बन जाएँ |
3 comments:
bahut accha likha hai....good thoughts ...!!
thnx peeyush!!!
chanpa hai mishra ji.........good job
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