Monday, August 1, 2011

मंथन

निन्द्य यज्ञ किया अभी, कि भ्रम से द्वन्द किया अभी
आवाज थी पुरुषार्थ की, अमोघ प्रण किया अभी,

अभी भी निष्ठ है कहीं, वो काल से प्रलब्ध ही,
वो आत्म में छिपी हुई, वो आत्म से अकुल कहीं |
वो सत्य की पुकार थी या तम से ही तकरार थी,
वो छल में आहूत स्वत्व थी या हतोज नरता निरस्त थी,
वो क्षत-विक्षत आस थी या एक नूतन प्यास थी,
 वो मरीचिका से घिरी या शिखर से विचलित मार्ग थी |
वो तलाश थी किसी संग की या सिहरती मन तरंग थी,
वो क्षितिज में व्याप्त  दीप्ति थी, या तम को ही ललकार थी,
अभी भी पग डिगा नहीं वो लक्ष्य से हटा नहीं,
कई थी अडचने मगर वो सत्य पे रुका कहीं |
न कहीं आवेश युद्ध की, लहर रुकी थी सिन्धु की,
ठहर चुके थे ज्वार भी, थे बंद तब कई द्वार भी,
तटस्थ कहीं ज्योति थी, शिथिल थे मन के तार भी,
वही पुकारता कहीं तलाश थी जिस प्रभात की |
असंख्य दर्प मिट गए अव्यक्त भाव व्यक्त थे,
वो मार्ग जो अवरुद्ध थे व्यवस्थ थे प्रशस्त थे,

ये द्वन्द अंतस में कहीं निश-दिन उमड़ते हैं कभी !
इस आत्म के संघर्ष में, आहत हुए विजयी कभी  |

---------------सुनील मिश्रा

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