Monday, August 1, 2011

पूछो मेरी ख़ामोशी से !

जीवन की पथरीली राहें !
कुछ करीब,
कुछ दूर किनारे !
भटक रहे,
किस खोज में जाने !
कितनी आवाजे दी थी,
पूछो मेरी ख़ामोशी से !

कब आहत,
कब है प्रसन्न मन !
संभला भी है,
बहका मन !
इनको समझाने में,
कितनी आवाज़े दी थी,
पूछो मेरी ख़ामोशी  से !

जब आशाएं,
पतझड़  बन,
व्याकुल करती हैं,
जीवन उपवन !
इनमे उत्साह जगाने को,
कितनी आवाजे दी थी ,
पूछो मेरी ख़ामोशी से !

अस्त हुआ रवि,
विकल हुआ नभ !
तम की छाया में,
गहराए गम के बादल !
इनको दूर भगाने में,
कितनी आवाजे दी थी,
पूछो मेरी ख़ामोशी से !




--------सुनील मिश्रा

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