Thursday, April 21, 2011

छितराए हुए शेर !

जज्बातों को कभी-कभी अल्फाज़ खोजने में बहुत मुश्किलें होती है ...
मेरे संक्षिप्त उर्दू शब्दकोश को खंघालने और मित्र 'साहिल' द्वारा भाषागत त्रुटियों के निवारण के उपरान्त कुछ छितराए हुए शेर !

अब भी ख़ामोशी से डर लगता है यारों,
कल रात बहुत शोर हुआ आशियाना-ए-दिल में !
वो भी रात भर रोया था और चाँद भी,
कुछ आसूं और कुछ ओस की बुँदे पत्तों पे थी !
यूँ बेरुखी से न देख संगदिल मुझको,
टूटते तारे भी ख्वाहिश को हवा देते हैं ! 
दफ्न कर सकूँ जहाँ उसकी यादों के लम्हे
ऐ रहगुजर कोई ऐसी कब्रगाह का पता  तो दे !
---------------------- सुनील मिश्रा
 

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