Wednesday, April 13, 2011

अब कोई ख़ास नहीं, कोई आस-पास नहीं

अब कोई ख़ास नहीं,
कोई आस-पास नहीं !

ढूँढती हैं नजरें पलछिन में,
जैसे वक़्त के थपेड़े,
जो निशान दे गए हैं,
मिटाने की कोशिश में,
अब कोई जान नहीं,
कोई अरमान नहीं !

अब भी लगता है कि,
डूबते हुए सितारे की रोशनी,
और नए सुबह की दस्तक,
एक दूजे से बेपरवाह हैं,
जैसे कोई अपना नहीं,
कोई बेगाना नहीं !

दूर दरिया के पास जलता दिया,
आँधियों से जूझता हुआ,
खुद को समेटता हुआ,
चांदनी रात से पूछता हो,
जैसे कोई परवाना नहीं,
कोई दीवाना नहीं !

पगडंडी पे खड़ा वो पथिक,
भूला हुआ है मंजिल,
खुद पे झुंझलाता हुआ,
खुद को बहलाता हुआ,
जैसे कोई बात नहीं,
आएगी अभी रात नहीं !

---------सुनील मिश्रा

1 comment:

Emoxpression said...

अच्छी कविता है...भावों से भरपूर ..!!