अब कोई ख़ास नहीं,
कोई आस-पास नहीं !
ढूँढती हैं नजरें पलछिन में,
जैसे वक़्त के थपेड़े,
जो निशान दे गए हैं,
मिटाने की कोशिश में,
अब कोई जान नहीं,
कोई अरमान नहीं !
अब भी लगता है कि,
डूबते हुए सितारे की रोशनी,
और नए सुबह की दस्तक,
एक दूजे से बेपरवाह हैं,
जैसे कोई अपना नहीं,
कोई बेगाना नहीं !
दूर दरिया के पास जलता दिया,
आँधियों से जूझता हुआ,
खुद को समेटता हुआ,
चांदनी रात से पूछता हो,
जैसे कोई परवाना नहीं,
कोई दीवाना नहीं !
पगडंडी पे खड़ा वो पथिक,
भूला हुआ है मंजिल,
खुद पे झुंझलाता हुआ,
खुद को बहलाता हुआ,
जैसे कोई बात नहीं,
आएगी अभी रात नहीं !
---------सुनील मिश्रा
1 comment:
अच्छी कविता है...भावों से भरपूर ..!!
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