Friday, August 20, 2010

वसुधा

जब से लिया जन्म हे मानव,
वसुधा का दोहन ही किया |
छाती पे तू अन्न उगाया,
पेट से पानी खींच लिया |

इतने से जो मन न भरा,
तो तरह तरह से नाश किया |
जंगल काटे, पर्वत तोड़े,
सागर का मंथन भी किया |

धरती के ही नाम पे तूने,
युद्ध कई लड़ डाले |
एटम बम, मिसाइल कितने,
माँ की छाती पे दागे |

कभी धर्म की ओंट लिया,
तो कभी स्वार्थ का साथी |
तू निर्दयी कभी ना समझा,
वसुधा माँ की भांती |

बाँट दिया टुकड़ो टुकड़ो में,
हर टुकड़े पे राज किया |
जिसको साथ न ले के आया,
उस पे तू अधिकार किया |

वसुधा की ममता तो देखो,
इतने पर भी लाड़ दिया |
मानव का मृत शरीर भी,
उसने अंगीकार किया |

नरता का अभिज्ञान रहे,
तो वसुधा का सम्मान करो |
सीचो इसको प्रेम से मानव,
हर प्राणी का मान धरो |

चाँद तुम्हारी मुट्ठी में हो,
अंतरिक्ष भी घर बन जाए |
पृथ्वी 'माँ' है ध्यान रहे,
सीमाएं कितनी बन जाएँ |

Saturday, August 7, 2010

मुखातिब

मुखातिब होके मुझसे वो यही हर बार कहते हैं ...
तालुक्कात की बात करते हो जज्बात कहा रखते हो !!

समां को जलते रहने की सदा ताकीद देते हो ..
कभी जब आंच आती है तो चेहरा क्यूँ ढकते हो !!

कभी आँखों में झांको और अपना अक्स पहचानों
ये अपनी अजनबीयत आईने में ढूंढते क्यूँ हो !!

अगर मुमकिन है चलना साथ तो आओ मेरे संग तुम
इन अनजान गलियों में भी बेगानों से लगते क्यूँ हो !!