Thursday, April 21, 2011

छितराए हुए शेर !

जज्बातों को कभी-कभी अल्फाज़ खोजने में बहुत मुश्किलें होती है ...
मेरे संक्षिप्त उर्दू शब्दकोश को खंघालने और मित्र 'साहिल' द्वारा भाषागत त्रुटियों के निवारण के उपरान्त कुछ छितराए हुए शेर !

अब भी ख़ामोशी से डर लगता है यारों,
कल रात बहुत शोर हुआ आशियाना-ए-दिल में !
वो भी रात भर रोया था और चाँद भी,
कुछ आसूं और कुछ ओस की बुँदे पत्तों पे थी !
यूँ बेरुखी से न देख संगदिल मुझको,
टूटते तारे भी ख्वाहिश को हवा देते हैं ! 
दफ्न कर सकूँ जहाँ उसकी यादों के लम्हे
ऐ रहगुजर कोई ऐसी कब्रगाह का पता  तो दे !
---------------------- सुनील मिश्रा
 

Wednesday, April 13, 2011

अब कोई ख़ास नहीं, कोई आस-पास नहीं

अब कोई ख़ास नहीं,
कोई आस-पास नहीं !

ढूँढती हैं नजरें पलछिन में,
जैसे वक़्त के थपेड़े,
जो निशान दे गए हैं,
मिटाने की कोशिश में,
अब कोई जान नहीं,
कोई अरमान नहीं !

अब भी लगता है कि,
डूबते हुए सितारे की रोशनी,
और नए सुबह की दस्तक,
एक दूजे से बेपरवाह हैं,
जैसे कोई अपना नहीं,
कोई बेगाना नहीं !

दूर दरिया के पास जलता दिया,
आँधियों से जूझता हुआ,
खुद को समेटता हुआ,
चांदनी रात से पूछता हो,
जैसे कोई परवाना नहीं,
कोई दीवाना नहीं !

पगडंडी पे खड़ा वो पथिक,
भूला हुआ है मंजिल,
खुद पे झुंझलाता हुआ,
खुद को बहलाता हुआ,
जैसे कोई बात नहीं,
आएगी अभी रात नहीं !

---------सुनील मिश्रा