उलझे-उलझे बाल हैं,
चाल पे न है काबू !
बहुत पढ़े डॉक्टर बने,
शकल बिमरिहा बाबू !
चप्पल पैरों की शोभा,
फटी पैंट है शान !
कर्ज तले है दब गया,
रोम-रोम इंसान !
जिस दिन ठाना पढ़ने को,
आज अभी भी कोस रहा हूँ !
नियति ने कैसा भरम दिया
आज अभी खोज रहा हूँ !
जीवन के सब मोह गवाए,
स्वावलंब आलम्ब हिलाए !
दिनचर्या को तोड़ दिया हूँ, ,
मै थीसिस पे जोर दिया हूँ !
रात्रि प्रहर में उल्लू के संग,
नित्य शोध मै करता हूँ !
जीवन में निष्कर्षों की,
परिभाषा भी मोड़ दिया हूँ !
दिल को यही तसल्ली है,
देश अर्थ में जीवन है !
आज नहीं तो कल सही,
चिरंजीव जो यौवन है !
--------सुनील मिश्रा